Monday, November 11, 2019

मेरा कविता संग्रह "कविता के बहाने "



परिंदे प्रकाशन, नयी दिल्ली से प्रकाशित मेरा कविता संग्रह "कविता के बहाने" अमेजन पर उपलब्ध है।  आप सब मित्रों से अनुरोध है कि इसे पढ़ें और अपनी बेबाक़ राय से अवगत कराएं।


Monday, September 14, 2015

पाँव के नीचे की जमीन

गाँव में
अब बच्चे नहीं खेलते
गुल्ली डंडा, कबड्डी, छुप्पा-छुप्पी
अब वे नहीं बनाते
मिट्टी की गाडी
नहीं पकड़ते तितलियाँ
गौरैयों और कबूतरों के
घोंसलों में देख उनके बच्चों को
अब वे नहीं होते रोमांचित   
अब उन्हें रोज नहीं चमकानी पड़ती
लकड़ी की तख्ती
ढिबरी की कालिख से मांज कर
और न ही उस पर बनानी पड़ती हैं
दूधिया सतरें खड़िया से
और अब वे नहीं रटते
पहाड़े
दो दूनी चार...

क्रिकेट, टीवी, कंप्यूटर
मोबाइल और सोशल मिडिया
के युग में,
खपरैल की जगह
स्कूल की पक्की इमारतों
और अंग्रेजी के पैबंद के
बावजूद
क्यों लगता है कि
इन बच्चों के लिए
हम  
नहीं तैयार कर पा रहे
वह ठोस जमीन
जहां बैठ
वे बुन सके सपने
भविष्य के
खड़े हो कर जिस पर वे
उड़ सके छू लेने को
आसमान.

Friday, July 24, 2015

ईश्वर की संताने



वे बच्चे
किसके बच्चे हैं
नाम क्या है उनका
कौन हैं इनके माँ बाप
कहाँ से आते हैं इतने सारे
झुण्ड के झुण्ड,
उन तमाम सरकारी योजनाओ के बावजूद
जो अखबारों और टीवी के
चमकदार विज्ञापनों में
कर रही हैं हमारे जीवन का कायाकल्प,
कालिख और चीथड़ो के ढकी
बहती नाक और चमकती आँखों वाली
जिजीविषा की ये अधनंगी मूर्तियाँ
जो बिखरी हुयी हैं
चमचमाते माल्स से लेकर
गंधाते रेलवे प्लेटफार्म्स तक,
बदनाम गलियों की तंग चौखटों से
भगवान के घरों की चौड़ी दालानों तक,
अभिशप्त बचपन में ही
बूढ़े हो जाने को,
अनवरत संघर्षरत
ढूढ़ रही जीवन
कूड़े के ढेर में
किसी लापरवाह ईश्वर की अनचाही संताने,
हमारी नपुंसक संवेदना के गवाह
क्या ये भी बच्चे हैं
इंडिया के
जो कि भारत है.

Tuesday, July 21, 2009

कौए

कौए
सुना है
विलुप्त हो रहें है।
क्या सच ?
पर क्या रमेसर की माँ
अब नहीं उड़ाएगी
मुंडेर से कौए?
पति के शहर से
लौटने की प्रत्याशा में।

क्या अब
झूठ बोलने पर
काला कौआ नहीं काटेगा
अब
नहीं पढेंगे बच्चे
'क' से कौआ।
कहानी सुनाती नानी
कैसे समझायेगी
उन्हें कि
क्या होता है मतलब
रानी से कौआ-हंकनी
बन जाने का।
जब दिखेंगे ही नहीं
कौए
कौन लेगा पिंडदान
पितृपक्ष में
क्या रहेंगे पितर
भूखे ही।
नई दुनिया में
नहीं रहेंगी
चीजें
बदरंग पुरानी दुनिया की
और कौए भी ।
पर रोज गुजरते हुए
गाजीपुर मुर्गामंडी के करीब से
देखता हूँ
कूड़े के पहाड़ पर मंडराती
कौओं की विशाल सेना।
पुरानी दुनिया के लिए
नई दुनिया में
बची है जगह
शायद यही।
नई दुनिया के लिए
कौओं का गायब होना
बस्तियों से,
कोई घटना नहीं।
वैस भी
सिर्फ़ अपने लिए जीने के दौर में
हर अस्तित्व है जरूरी
तभी तक
जब तब है वह मेरे काम का-
अभी और इसी वक्त ।
तो फ़िर चलिए पढ़ते हैं आज
मर्सिया कौओं का
कल हमारी बारी होगी।

Thursday, April 9, 2009

अशोक

दरवाजे पर का बूढ़ा अशोक
कहते हैं जिसे रोपा था
मेरे दादा ने,
खडा है अब भी,
अब जबकि
हमने बाँट ली है
उसके नीचे की एक एक पग धरती
घर, आंगन और
मन्दिर के देवता तक ।
खड़ा है वह अब भी
लुटाता हम पर अपनी छांह की आशीष ।

उसकी लचकती डालियाँ
बुलाती हैं अब भी
घसीट लो मचिया इधर ही,
आओ थोड़ी देर पढें
मुंशी जी का 'गोदान '
या गुरुदेव की 'गीतांजलि।'
या फ़िर आओ जमे
ताश की बाज़ी ही,
तब तक जब तक
दादी आकर फेंक न दें पत्ते
मीठी लताड़ के साथ।

पूर्वज
हम ज़रूर आते
बैठने तुम्हारी ठंडी छाँव में
पर नहीं लांघी जाती हमसे
हमारी ही खींची हुई
लक्ष्मण रेखाएं,
बाज़ार के दबाव से
कमज़ोर हुए हमारे पाँव
असमर्थ हैं पार कर पाने में
झूठे दंभ की ढूहों को।
सेंसेक्स के उतार चढाव में
धूल खा रहे हैं
प्रेमचंद और टैगोर
किसी पुरानी अलमारी के कोने में।

अब तो अगर कभी
वैश्वीकरण और बाज़ार से
,
मुक्त हुए ,
अगर मिली फुरसत बैठने की
फ़िर जिंदगी के साथ,
हम आयेंगे बैठने
फ़िर तुम्हारी छाया में।

Saturday, March 28, 2009

तुम फ़िर आना .....

तुम फ़िर आना
हम फ़िर बैठेंगे चल कर
जमुना की ठंडी रेत पर
और करेंगे बातें
देर तक
कविता की,
कहानियों की
और तितलियों की तरह
उड़ती फिरती लड़कियों की।

तुम फ़िर आना
मौसम के बदलने की तरह
हम फ़िर बैठेंगे चल कर
कंपनी बाग़ की
किसी टूटी बेंच पर
हरियाली की उस उजड़ रही
दुनिया के बीच
देर तक महकता रहेगा गुलाब
हमारे भीतर और बाहर।

तुम फ़िर आना
हम फ़िर बैठेंगे चल कर
कालेज की कैंटीन में
समोसे की सोंधी खुशबू के बीच
ठंडी चाय पीते
देर तक करेंगे गरमागरम बहस
राजनीति पर, अर्थनीति पर
और मन ही मन जोडेंगे हिसाब
कैसे चलेगा खर्च
बाबू के मनीआर्डर के आने तक।

तुम फ़िर आना।

Wednesday, January 14, 2009

कविता के बहाने

वातानुकूलित कमरों की
बासी शीतलता में
जो जन्म लेती है
काफ़ी के प्यालों में,
आकर ग्रहण करती है
सिगरेट के धुएँ से
कविता नहीं ।

कविता वह नहीं
जिसका शव प्रकाशन के पश्चात
समीक्षक की मेज पर पड़ा है
पोस्ट मार्टम की प्रतीक्षा में ।

कविता तो लिखता है
वह बूढा
हल की नोक से
धरती की छाती पर
उसकी आँखों में झिलमिल है
पीड़ा का महाकाव्य
उसके खुरदुरे हाथों पर अंकित है
जीवन संधर्ष की गौरव गाथा ।

धान रोपते हाथों का मंत्र सुनो
ढोर चराते नन्हे बालक
क्या किसी कविता की पंक्ति नही लगते ।
मित्र
कविता
किसी रूपसी के पायल की रुनझुन नहीं
तपती दोपहरी में
पत्थर की शिलाओं पर पड़ती
हथौडे की टंकार है
दबी कुचली उन्गलिओं से टपकता
लहू है ।

कविता
किसी सीजेरियन बच्चे के जन्म का
चिकित्सकीय अभिलेख नहीं
प्रसव की वेदना का इतिहास है ।

कविता
सामाजिक जानवर के
मनुष्य बनने का
दस्तावेज़ है
अनुभूतियों की यात्राकथा पर
समय का हस्ताक्षर है।

(पुनर्प्रस्तुति)

Wednesday, December 24, 2008

इन्द्र

इन्द्र
क्यों हो तुम इतने
पुंसत्वहीन ।
क्यों नहीं आया
कभी मन में तुम्हारे कि
तुम भी करो उद्योग
बढ़ाने को
अपना बल, पौरुष,
शक्ति और कौशल ।

क्यों नही की तपस्या
कभी तुमने ,
क्यों होते रहे तुम सदैव
शंकाग्रस्त
दूसरों के तप से ।

क्यों नही आई लज्जा तुम्हें
माँगते कवच- कुंडल
पुत्र सरीखे कर्ण से ।
और तो और
नहीं झिझके तुम
फैलाने में हाथ
अपने चिर शत्रु
विरोचन के सामने भी।
बूढे दधिची से मांग ली
तुमने हड्डियाँ तक।

क्यों नहीं लगाई
प्राणों की बाज़ी कभी तुमने।
क्यों नहीं समझा
कभी श्रेयस्कर
मिट जाना संघर्ष करते
यहाँ-वहाँ घिघियाने के बजाय।

संभवतः दोष तुम्हारा नहीं
मित्र
यह प्रभाव है
उस सिंहासन का ही ,
जिस पर बैठते ही
विगलित हो जाता है सारा उद्दात्त ।
जिससे नहीं बच पाये
नहुष भी।
या शायद उद्यम और उत्सर्ग
नहीं बने देवताओं के लिए ।

धन्यवाद प्रभु,
तुमने हमें
देवता नहीं बनाया
तुम्हारा उपकार
तुमने हमें रहने दिया
मनुष्य ही।

Sunday, November 23, 2008

महाभारत



(१९८९ में बनी पीटर ब्रुक्स की फ़िल्म 'महाभारत ' का एक दृश्य)


महाभारत
कथा नहीं
सत्य है हमारे समय का
और हर उस समय का
जहाँ
कन्फ्यूज्ड प्रतिबद्धताएं,
मिसप्लेस्ड आस्थाएं,
मूल्यहीनता और अवसरवाद
हों जीवन के मानदंड।
जब बंद हो ध्रितराष्ट्र की आँखें
न्याय की ओर से,
देवव्रत
व्यवस्था के पोषण को
मान ले अपना धर्म।
आचार्य द्रोण का कर्तव्य
पेट पालने की मजबूरी के आगे हो
नतमस्तक
तैयार हो जाती है
पृष्ठभूमि
महाभारत की।
दुर्योधन और दुःशासन
असली खलनायक नहीं
वे तो मुहरे मात्र हैं
शकुनी की मुट्ठी के।
अर्जुन और एकलव्य
होते हैं शिकार
एक ही व्यवस्था के
जो बाँध लेती है पट्टी
अपनी आंखों पर गांधारी की तरह ।
अपने अपमान से क्षुब्ध
द्रौपदी
भूल जाती है कि
दूसरों की जाति और विकलांगता पर
व्यंग करते
उसके संस्कारों की ही
चरम परिणति है
महाभारत।
जो कथा नहीं
सत्य है ।
संभवत
हमारे
समय का भी ।

Saturday, November 15, 2008

आग

१-
दीये की लौ से
चिता की लपटों तक
जीवन का रिश्ता
आग का रिश्ता।

२-
सात फेरे अग्नि के....
चलेंगे साथ-साथ
जीवन के
अग्निपथ पर।

३-
न जली आग
चूल्हे में
न बुझ सकी आग
पेट की।

४-
आग सुलगे
दिलों में तो
प्रेमगीत ,
दिमागों में तो
इंक़लाब ।

Wednesday, October 15, 2008

बेटियाँ

वे हमारे चारो ओर
बिखरी रहतीं हैं
सुगन्धि की तरह ,
सौंदर्य और मासूमियत के
एहसास की तरह ,
ईश्वर के होने की तरह।

जन्म के पूर्व ही
मिटा दिए जाने की
हमारी छुद्र साजिशों के बीच
वे ढीठ
उग आती हैं
हरी डूब की तरह
और न जाने कब बड़ी हो
हमें भर देती हैं
बडक्पन के एहसास से ,
उनकी उपस्थिति मात्र से
हम हो जाते हैं
सुसंस्कृत।

उनकी किलकारियों से
भर जाता है घर में
मौसमों का मंद कलरव।
और उनके गम-सुम होते ही
बोलने लगता है
घर का सन्नाटा भी।

वे मुस्कराहट बन
चिपकी रहती है
हर समय
कभी करा देती याद
नानी
और कभी ख़ुद
दादीमाँ बन
करती मजबूर हमें
फ़िर से बच्चा बन जाने को।

उम्र भर
परायी समझे जाने के बावजूद
भरी भरी आकंठ
अपनेपन से
ईश्वर के वरदान की तरह
वे हमारे लिए
दुनिया के हर कोने में
जल रही होती हैं
प्रार्थना हे दीपक की तरह।

Saturday, October 4, 2008

नदी जो कभी थी ...

नदी
देर तक इठलाती रहती
आलिन्गनबद्ध,
बातें करती
न जाने कितनी देर।
छोटी सी नाव में
हिचकोले लेती , निहारती
लहरों और चन्द्रमा की
लुकाछिपी।

नदी तब छेड़ देती
वाही पुराना गीत
जो बरसों से गाती हैं
'गवांर' औरतें ।
और गीत का नयापन भर देता
मन के कूल किनारों को
बांसुरी की तान से ।
तिरोहित हो जाता दाह
तन का, मन का।

बरसों बाद लौटा हूँ ।
साँझ ढले
खोजता निकल आया हूँ दूर,
न जाने कहाँ गुम है
वह छोटी नाव ।
सड़क और पुलों की भीड़ से डरी
नदी,
कहीं चली गई ।
किसी ने कहा -
कभी-कभी दिख जाती है
उसकी गंदलाई प्रतिछाया
बरसातों में।

लौट आता हूँ
एक लम्बी निःश्वास ले,
उलझ जाता हूँ फ़िर
अपने लैपटाप से ।
नदी अब शेष है
केवल
मेरी स्मृतियों के अजायबघर में।



Tuesday, September 30, 2008

खिड़की के पास वाला पेड़

रात के चौथे पहर
अंधेरे में
तन कर खड़ा वह पेड़ ,
यौवन से आप्लावित
मानो प्रतीक्षा में
प्रेयसी की।
निर्भीक , निश्चिंत
हवा के झोकों संग हिलता
न हो उतरा नशा
मानो अभी तक
रात की मदिरा का।
मद्धम चाँदनी में
पत्तियों पर चमक रहीं
बारिष की हीरक बूँदें ,
श्रम के स्वेदबिंदु।
उषा के साथ
आएगी पहली किरण
लिपट जाएगी उसके अंग-अंग से।
महक उठेगी
उसे छू कर
प्रात समीर।
उजाला उसके स्पर्श से
हो जाएगा
मुलायम, मखमली।
मेरी खिड़की से झाँक
उसकी टहनी
फ़िर टोकेगी मुझे
की उठो !
आगया एक और प्रभात
जीवन में।
चलता रहेगा यह क्रम
निरंतर
खिड़की के पास वाला पेड़
लुटाता रहेगा स्नेह
हम पर अनवरत।
दुआ करो
बचा रहे उसका अस्तित्व
हमारी दिन-ब-दिन वृद्धिमान
लालसा की कुल्हाड़ी से।

Thursday, September 25, 2008

दहशतगर्द

तुम
स्कूल जाते बच्चों के
बस्तों में
भर दोगे बारूद
परियों की कहानियों वाली
किताबों की जगह।
उनके नन्हे-मुन्ने हाथों में
पकड़ा दोगे
बंदूकें,
कलम की जगह ।
इमले की जगह
उनकी तख्ती पर
लिख दोगे इबारत
आतंक की।

तुम नोच लोगे
रंग
हर तितली के पंख से।
हर फूल की खुशबू को
बदल दोगे
सड़ांध में ।

तुम्हारे पैरों की आहट
हर संगीत को
तब्दील कर देगी
मरघटी सन्नाटे में।

प्रेम और संवेदना का
हर रिश्ता
बदल जाएगा
घृणा की बजबजाती कीचड़ में
तुम्हारे शापित स्पर्श से।

तुम
नफ़रत की आग में
जला कर रख दोगे
हर फूल को
हर पत्ते को
हरियाली के एक एक रेशे को।

तुम हो दुश्मन
सुन्दरता के,
रचनात्मकता के,
प्रेम और जीवन के ,
और जीवन में जो कुछ है सुंदर
उस सब के।

तुम
छोड़ जाओगे
अपने
पीछे बस
धुएँ और धूल का गुबार
क्षत-विक्षत लाशें और
सडकों पर बिखरा
मासूमों का लहू।

तुम
मज़हब के ,
धर्मयुद्ध के
नाम पर
बदलने में लगे हो
धरती को नर्क में ।
फरिश्तो के वेश में
तुम हो
नुमाइंदे शैतान के ।

खर-पतवार की तरह
एक दिन
तुम भी
उखाड़ कर फेंक दिए जाओगे।
मत भूलो कि
आए हैं तुम जैसे पहले
और भी
ध्वंस और नफ़रत की
लहरों पर सवार
पर मिट गए है सब
टकरा कर
मानवता की चट्टानी
जिजीविषा से।

दोस्त
जल जाओगे
तुम भी एक दिन
अपने ही नर्क में
पड़े इतिहास के किसी
कूडेदान में।
और बहाएगा नहीं
कोई दो आंसू भी
तुम्हारे लिए।


Tuesday, September 23, 2008

विस्मृति

पूर्वज,
चौराहों पर लगे,
कौओं और कबूतरों की
बीट से लिथड़े
तुम्हारे बुत।
तुम्हारी विस्मृति के
स्मृति-चिह्न ।

Sunday, September 21, 2008

इन्द्र धनुष

मुंडेर से उतर कर
धूप
बरांडे के
दूर वाले छोर पर
अटक जाती है।
न जाने क्यों ?
घिर जाता है मन
एक उदास खामोशी से।

सुगन्धि का एक वलय
तैर जाता है
आंखों के आगे
यादों का इन्द्र धनुष
खिंच जाता है
मन के एक सिरे से
दूसरे सिरे तक।

एक बच्चा भागता है
कटी हुई पतंग के पीछे।
तितलियाँ सी उड़ती है
आंखों में,
लहरा उठता है
एक आँचल गुलाबी,
या फ़िर शायद धानी
............सुनहरा
सबकुछ गड्मड।
आँचल की एक कोर
फंसी रह गई है
मन के किसी कोने से।

टप
बारिस की एक बूँद
भिगो गई हथेली ।
घिर आया सावन
यादों का।
अपनी किताबें
किए सर के ऊपर
बारिस से बचने को
गुलमुहर तक चली आई
वह लड़की।
जब घूरते हुए उसे
बेवकूफों की तरह
पूछा था मैंने कुछ ऐसे ही।

कैफिटेरिया में उस दिन
ठंढ से कुड़मुड़ाते जब वह
पी गई थी बची हुई काफ़ी
मेरे प्याले की ,
अनजाने में या शायद
जानबूझ कर।
और फ़िर बिखर गई थी
हमारे चारो ओर
एक सिन्दूरी आभा।

स्मृतियों के सूत्र
खिसकने लगते हैं
मुट्ठी से ,
चाहे कितना कस कर पकडो।
जीवन पहुँच जाता है
कहीं से कहीं।

मुंडेर पर की धूप
कब की
बरांडे से सरकती
दूर चली गई है
उदासी की एक चादर
अपने पीछे छोड़ कर।

Tuesday, September 16, 2008

आम आदमी की कविता

वह अधनंगा,
मरियल सा आदमी
जो अभी-अभी
तुम्हारी विदेशी कार के
नीचे आते आते बचा है।
और जिसके बारे में
सोच रहे हो तुम
कि क्यों बनाता है ऊपर वाला
ऐसे जाहिलों को,
नहीं है जिन्हें तमीज
ठीक से सड़क पर चलने तक की।
या फ़िर सोच रहे होंगे कि
बेवकूफ मरेगा अपनी गलती से
और दोष मढ़ जायेगा
तुम्हारे सिर।

मगर दोस्त
तुम हो परेशान नाहक ही
उसने तो जरूरी नहीं समझा
पलट कर देखना तक।
न ही दी तुम्हे गालियाँ
मुंह बिचका कर।
उसकी नज़र में हो तुम
अस्तित्वहीन।
तुम्हारी चमचमाती कार
कहीं नहीं है
उसकी प्राथमिकताओं में।
उसे जल्दी है जा कर सींचने की
मुरझा रहे पौधों को।
दूहनी है गाय
दुलारने है बछडे।

नहा कर जल भी देना है
नहीं तो
रह जायेगे प्यासे ही
बरगद के नीचे भोले बाबा।

नहीं देख पायेगीं
रात की शराब और
डिस्को की चकाचौंध रौशनी से
चुन्धियाई तुम्हारी आँखें
यह सत्य कि
बची है जो कुछ तहजीब,
संस्कृति और सम्मान,
इंसानियत और कर्तव्यनिष्ठा,
वह मरियल आदमी
उसका वाहक है।

उसने नहीं है खाया
कमीशन किसी सौदे में,
नहीं किया है कोई घोटाला।
वह नहीं रहा है शामिल
किसी धरने, जुलूस और दंगे में।
नहीं तोडा है उसने
कोई पूजागृह।
उसे नहीं आकृष्ट करते
तुम्हारे क्लब और माल।

वह तो बस
अपना खून पसीना एक कर
देश की माटी में,
जुटा है जोड़ने में
एक-एक ईंट
ताकि हो सके पथ निष्कंटक
आने वाली पीढियों का।
ताकि मिट सके
भूख, बिमारी, गरीबी और जहालत,
ताकि बन सके देश फ़िर से
महान।
ताकि सहूलियत से
दौड़ती रहे
तुम्हारी चमचमाती कारे।




Friday, September 12, 2008

एक ग़ज़ल मेरे शहर के नाम

आख़िर बदइंतजामियों की कोई इन्तिहाँ तो हो।
मेरे शहर के हाल पर कोई तप्सरा तो हो।

गड्ढों में सड़क गुम हैं, सीवर उफ़ान पर,
हाकिम को इंतज़ार कोई हादसा तो हो।

बदलेगा ये निजाम भी हर दौर की तरह,
सीनों में आग, जेहन में कोई जलज़ला तो हो।

टकरा के टूट जायेगी शमशीर हो कोई,
पत्थर से हौसले हों, ख़ुद पे भरोसा तुझे तो हो।

तौबा तेरे ज़माल की जादूनिगारियाँ ,
क्या दूँ मिसाल तुझसा कोई दूसरा तो हो।

हमने भी जीना सीख लिया है तेरे बगैर,
आख़िर कहीं पे ख़त्म ऐ भी सिलसिला तो हो।

Wednesday, September 10, 2008

नई तहजीब

नंगापन
नया मंत्र है
सभ्यता का।
स्वतंत्रता और स्वच्छंदता
हैं गडमड।
विचार करना है पिछड़ापन
सोचना छोड़ो।
कपड़े उतार डालो
अपने नहीं तो दूसरों के।
नंगे हो जाओ
यही है आज की मांग।
नंगापन
विचार में,
भाषा में,
व्यवहार में
बाज़ार का ताकाज़ा है।

बाज़ार
जो नई सदी का देवता है।
जिसके दबाव में
हैरीपॉटर की काल्पनिक त्रासदी
और ब्रितानी स्पीयर्स के कौमार्य
की चर्चाओं के बीच
ख़बर नहीं बन पाती
भूख से
हजारों अफ्रीकन बच्चों की मौत।

भावनाएं बंधन हैं,
काट फेंको।
नंगे होकर ही
बिक सकोगे तुम,
माल की तरह।
संकोच छोड़ो ,
उतार डालो
अपनी आत्मा पर पड़ा
हर आवरण।
वास्तु बन जाओ।
स्वयं को तब्दील कर लो
केवल शरीर में।
मन और आत्मा की छोड़ो।

शरीर ही धुरी है पृथ्वी की
जो घूमती है
बाज़ार के चारो ओर,
सीख लो भूगोल का
यह अधुनातन सिद्धांत।
उद्दाम भोग के महायज्ञ में
होम कर दो स्वयं को।
इसी से होगा प्राप्त
आधुनिक निर्वाण।

जानवरों की चाहारदीवारी से निकल
मनुष्यता की चौखट तक
आने में लगे हों भले
हजारों साल।
बन जाने में पशु
लगेगा नहीं समय कुछ भी
सहस्त्राब्दियों के बंधन काट
हम हो जायेगे आधुनिक
चुटकियों में।
विचित्र है माया
बाज़ार की।

Tuesday, September 2, 2008

शब्द सन्दर्भ

शब्द
सांत्वना और संवेदना की
रसधार से संपृक्त
स्नेह और पीड़ा के
आदिगीत,
मास्टर जी की बेंत
और अम्मा की लोरी से
अभिमंत्रित,
सीपियों और कंचों से निर्मल
जगमग शब्द।
प्रेमपत्रों से आती
मेहंदी की सुगंध
मन-आँगन में खिले गुलमुहर।
नानी की कहानियों की
राजकुमारी जैसे
सुंदर थे शब्द।

फ़िर मैंने शब्दों में
घोल दिए
शास्त्र और दर्शन
ज्ञान और विज्ञान
सांख्य और योग के तर्क
गुरुत्व और सापेक्षता के सिद्धांत
राजनीति और अर्थनीति
विचार चेतना की समिधा से
गढ़ लिए हथियार।
आवाजों के रौरव से
टपकता तेजाब
शापित अखबारों के
अंतहीन पन्नों पर बिखरे
मृत्यु और ध्वंश के संदेशवाहक
ईसा की सलीब में ठुकी हुई
कीलों से निर्मम ,
नानी की कहानियों के राक्षस सदृश
भयानक हो गए हैं
शब्द।