Wednesday, October 15, 2008

बेटियाँ

वे हमारे चारो ओर
बिखरी रहतीं हैं
सुगन्धि की तरह ,
सौंदर्य और मासूमियत के
एहसास की तरह ,
ईश्वर के होने की तरह।

जन्म के पूर्व ही
मिटा दिए जाने की
हमारी छुद्र साजिशों के बीच
वे ढीठ
उग आती हैं
हरी डूब की तरह
और न जाने कब बड़ी हो
हमें भर देती हैं
बडक्पन के एहसास से ,
उनकी उपस्थिति मात्र से
हम हो जाते हैं
सुसंस्कृत।

उनकी किलकारियों से
भर जाता है घर में
मौसमों का मंद कलरव।
और उनके गम-सुम होते ही
बोलने लगता है
घर का सन्नाटा भी।

वे मुस्कराहट बन
चिपकी रहती है
हर समय
कभी करा देती याद
नानी
और कभी ख़ुद
दादीमाँ बन
करती मजबूर हमें
फ़िर से बच्चा बन जाने को।

उम्र भर
परायी समझे जाने के बावजूद
भरी भरी आकंठ
अपनेपन से
ईश्वर के वरदान की तरह
वे हमारे लिए
दुनिया के हर कोने में
जल रही होती हैं
प्रार्थना हे दीपक की तरह।

Saturday, October 4, 2008

नदी जो कभी थी ...

नदी
देर तक इठलाती रहती
आलिन्गनबद्ध,
बातें करती
न जाने कितनी देर।
छोटी सी नाव में
हिचकोले लेती , निहारती
लहरों और चन्द्रमा की
लुकाछिपी।

नदी तब छेड़ देती
वाही पुराना गीत
जो बरसों से गाती हैं
'गवांर' औरतें ।
और गीत का नयापन भर देता
मन के कूल किनारों को
बांसुरी की तान से ।
तिरोहित हो जाता दाह
तन का, मन का।

बरसों बाद लौटा हूँ ।
साँझ ढले
खोजता निकल आया हूँ दूर,
न जाने कहाँ गुम है
वह छोटी नाव ।
सड़क और पुलों की भीड़ से डरी
नदी,
कहीं चली गई ।
किसी ने कहा -
कभी-कभी दिख जाती है
उसकी गंदलाई प्रतिछाया
बरसातों में।

लौट आता हूँ
एक लम्बी निःश्वास ले,
उलझ जाता हूँ फ़िर
अपने लैपटाप से ।
नदी अब शेष है
केवल
मेरी स्मृतियों के अजायबघर में।



Tuesday, September 30, 2008

खिड़की के पास वाला पेड़

रात के चौथे पहर
अंधेरे में
तन कर खड़ा वह पेड़ ,
यौवन से आप्लावित
मानो प्रतीक्षा में
प्रेयसी की।
निर्भीक , निश्चिंत
हवा के झोकों संग हिलता
न हो उतरा नशा
मानो अभी तक
रात की मदिरा का।
मद्धम चाँदनी में
पत्तियों पर चमक रहीं
बारिष की हीरक बूँदें ,
श्रम के स्वेदबिंदु।
उषा के साथ
आएगी पहली किरण
लिपट जाएगी उसके अंग-अंग से।
महक उठेगी
उसे छू कर
प्रात समीर।
उजाला उसके स्पर्श से
हो जाएगा
मुलायम, मखमली।
मेरी खिड़की से झाँक
उसकी टहनी
फ़िर टोकेगी मुझे
की उठो !
आगया एक और प्रभात
जीवन में।
चलता रहेगा यह क्रम
निरंतर
खिड़की के पास वाला पेड़
लुटाता रहेगा स्नेह
हम पर अनवरत।
दुआ करो
बचा रहे उसका अस्तित्व
हमारी दिन-ब-दिन वृद्धिमान
लालसा की कुल्हाड़ी से।

Thursday, September 25, 2008

दहशतगर्द

तुम
स्कूल जाते बच्चों के
बस्तों में
भर दोगे बारूद
परियों की कहानियों वाली
किताबों की जगह।
उनके नन्हे-मुन्ने हाथों में
पकड़ा दोगे
बंदूकें,
कलम की जगह ।
इमले की जगह
उनकी तख्ती पर
लिख दोगे इबारत
आतंक की।

तुम नोच लोगे
रंग
हर तितली के पंख से।
हर फूल की खुशबू को
बदल दोगे
सड़ांध में ।

तुम्हारे पैरों की आहट
हर संगीत को
तब्दील कर देगी
मरघटी सन्नाटे में।

प्रेम और संवेदना का
हर रिश्ता
बदल जाएगा
घृणा की बजबजाती कीचड़ में
तुम्हारे शापित स्पर्श से।

तुम
नफ़रत की आग में
जला कर रख दोगे
हर फूल को
हर पत्ते को
हरियाली के एक एक रेशे को।

तुम हो दुश्मन
सुन्दरता के,
रचनात्मकता के,
प्रेम और जीवन के ,
और जीवन में जो कुछ है सुंदर
उस सब के।

तुम
छोड़ जाओगे
अपने
पीछे बस
धुएँ और धूल का गुबार
क्षत-विक्षत लाशें और
सडकों पर बिखरा
मासूमों का लहू।

तुम
मज़हब के ,
धर्मयुद्ध के
नाम पर
बदलने में लगे हो
धरती को नर्क में ।
फरिश्तो के वेश में
तुम हो
नुमाइंदे शैतान के ।

खर-पतवार की तरह
एक दिन
तुम भी
उखाड़ कर फेंक दिए जाओगे।
मत भूलो कि
आए हैं तुम जैसे पहले
और भी
ध्वंस और नफ़रत की
लहरों पर सवार
पर मिट गए है सब
टकरा कर
मानवता की चट्टानी
जिजीविषा से।

दोस्त
जल जाओगे
तुम भी एक दिन
अपने ही नर्क में
पड़े इतिहास के किसी
कूडेदान में।
और बहाएगा नहीं
कोई दो आंसू भी
तुम्हारे लिए।


Tuesday, September 23, 2008

विस्मृति

पूर्वज,
चौराहों पर लगे,
कौओं और कबूतरों की
बीट से लिथड़े
तुम्हारे बुत।
तुम्हारी विस्मृति के
स्मृति-चिह्न ।